मंगलवार, 22 जून 2010

राजस्‍थान की प्रमुख बोलियां

भारत के अन्य राज्यों की तरह राजस्थान में कई बोलियाँ बोली जाती हैं।
वैसे तो समग्र राजस्थान में हिन्दी बोली का प्रचलन है लेकिन लोक-भाषएँ जन
सामान्य पर ज्यादा प्रभाव डालती हैं। जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने
राजस्थानी बोलियों के पारस्परिक संयोग एवं सम्बन्धों के विषय में लिखा
तथा वर्गीकरण किया है।

ग्रियर्सन का वर्गीकरण इस प्रकार है :-

१. पश्चिमी राजस्थान में बोली जाने वाली बोलियाँ - मारवाड़ी, मेवाड़ी,
ढारकी, बीकानेरी, बाँगड़ी, शेखावटी, खेराड़ी, मोड़वाडी, देवड़ावाटी आदि।

२. उत्तर-पूर्वी राजस्थानी बोलिया ँ - अहीरवाटी और मेवाती।

३. मध्य-पूर्वी राजस्थानी बोलिया ँ - ढूँढाड़ी, तोरावाटी, जैपुरी, काटेड़ा,
राजावाटी, अजमेरी, किशनगढ़, नागर चोल, हड़ौती।

४. दक्षिण-पूर्वी राजस्थान - रांगड़ी और सोंधवाड़ी

५. दक्षिण राजस्थानी बोलियाँ - निमाड़ी आदि।

मोतीलाल मेनारिया के मतानुसार राजस्थान की निम्नलिखित बोलियाँ हैं :-

१. मारवाड़ी
२. मेवाड़ी
३. बाँगड़ी
४. ढूँढाड़ी
५. हाड़ौती
६. मेवाती
७. ब्रज
८. मालवी
९. रांगड़ी

बोलियाँ जहाँ बोली जाती हैं :-

१. मारवाड़ी - जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर व शेखावटी

२. मेवाड़ी - उदयपुर, भीलवाड़ा व चित्तौड़गढ़

३. बाँगड़ी - डूंगरपूर, बाँसवाड़ा, दक्षिण-पश्चिम उदयपुर

४. ढूँढाड़ी - जयपुर

५. हाड़ौती - कोटा, बूँदी, शाहपुर तथा उदयपुर

६. मेवाती - अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली (पूर्वी भाग)

७. ब्रज - भरतपुर, दिल्ली व उत्तरप्रदेश की सीमा प्रदेश

८. मालवी - झालावाड़, कोटा और प्रतापगढ़

९. रांगड़ी - मारवाड़ी व मालवी का सम्मिश्रण

मारवाड़ी : राजस्थान के पश्चिमी भाग में मुख्य रुप से मारवाड़ी बोली
सर्वाधिक प्रयुक्त की जाती है। यह जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर और शेखावटी
में बोली जाती है। यह शुद्ध रुप से जोधपुर क्षेत्र की बोली है। बाड़मेर,
पाली, नागौर और जालौर जिलों में इस बोली का व्यापक प्रभाव है।

मारवाड़ी बोली की कई उप-बोलियाँ भी हैं जिनमें ठटकी, थाली, बीकानेरी,
बांगड़ी, शेखावटी, मेवाड़ी, खैराड़ी, सिरोही, गौड़वाडी, नागौरी, देवड़ावाटी
आदि प्रमुख हैं। साहित्यिक मारवाड़ी को डिंगल कहते हैं। डिंगल साहित्यिक
दृष्टि से सम्पन्न बोली है।

मेवाड़ी : यह बोली दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर, भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़
जिलों में मुख्य रुप से बोली जाती है। इस बोली में मारवाड़ी के अनेक
शब्दों का प्रयोग होता है। केवल ए और औ की ध्वनि के शब्द अधिक प्रयुक्त
होते हैं।

बांगड़ी : यह बोली डूंगरपूर व बांसवाड़ा तथा दक्षिणी-पश्चिमी उदयपुर के
पहाड़ी क्षेत्रों में बोली जाती हैं। गुजरात की सीमा के समीप के क्षेत्रों
में गुजराती-बाँगड़ी बोली का अधिक प्रचलन है। इस बोली की भाषागत विशेषताओं
में च, छ, का, स, का है का प्रभाव अधिक है और भूतकाल की सहायक क्रिया था
के स्थान पर हतो का प्रयोग किया जाता है।

धड़ौती : इस बोली का प्रयोग झालावाड़, कोटा, बूँदी जिलों तथा उदयपुर के
पूर्वी भाग में अधिक होता है।

मेवाती : यह बोली राजस्थान के पूर्वी जिलों मुख्यतः अलवर, भरतपुर, धौलपुर
और सवाई माधोपुर की करौली तहसील के पूर्वी भागों में बोली जाती है। जिलों
के अन्य शेष भागों में बृज भाषा और बांगड़ी का मिश्रित रुप प्रचलन में है।
मेवाती में कर्मकारक में लू विभक्ति एवं भूतकाल में हा, हो, ही सहायक
क्रिया का प्रयोग होता है।

बृज : उत्तरप्रदेश की सीमा से लगे भरतपुर, धौलपुर और अलवर जिलों में यह
बोली अधिक प्रचलित है।

मालवी : झालावाड़, कोटा और प्रतापगढ़ जिलों में मालवी बोली का प्रचलन है।
यह भाग मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र के समीप है।

रांगड़ी : राजपूतों में प्रचलित मारवाड़ी और मालवी के सम्मिश्रण से बनी यह
बोली राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग में बोली जाती है।

ढूँढाती : राजस्थान के मध्य-पूर्व भाग में मुख्य रुप से जयपुर, किशनगढ़,
अजमेर, टौंक के

समीपवर्ती क्षेत्रों में ढूँढ़ाड़ी भाषा बोली जाती है। इसका प्रमुख उप-
बोलियों में हाड़ौती, किशनगढ़ी, तोरावाटी, राजावाटी, अजमेरी, चौरासी,
नागर, चौल आदि प्रमुख हैं। इस बोली में वर्तमान काल में छी, द्वौ, है आदि
शब्दों का प्रयोग अधिक होता है।

सामान्‍य ज्ञान

1. किस शासक ने राजकीय अभिलेखों को खुदवाने की परम्परा शुरू कर भारतीय
इतिहास को व्यवस्थित रूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है ?
उत्तर: मौर्य सम्राट अशोक ने
2. 'तहकीक-ए-हिंद' नामक ग्रन्थ की रचना किसने की थी ?
उत्तर: अलबरूनी ने
3. किन सैन्धव स्थलों से यज्ञीय वेदियाँ प्राप्त हुई हैं ?
उत्तर: लोथल और कालीबंगा से
4. महावीर का जन्म 540 ईसा पूर्व के लगभग वैशाली में कहाँ हुआ था ?
उत्तर: कुंडग्राम में
5. पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध मुहम्मद गौरी की सहायता करने के कारण किस
शासक को देशद्रोही की संज्ञा दी जाती है ?
उत्तर: कन्नौज के राजा जयचंद को
6. सल्तनत काल के सुल्तानों द्वारा बनवाई गयी मस्जिदों में सबसे पहली
कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण किसने करवाया था ?
उत्तर: कुतुबुद्दीन ऐबक ने
7. किस प्रसिद्द सूफी संत के जीवनकाल में एक के बाद एक सात शासक दिल्ली
सल्तनत की गद्दी पर आसीन हुए ?
उत्तर: निज़ामुद्दीन औलिया के जीवनकाल में
8. नूरजहाँ ने अपने प्रभाव से खुद 'पादशाह बेगम' की उपाधि ली और अपने
पिता को 'अत्माद-उद्द-दौला' की उपाधि प्रदान करवाई. उसके पिता का नाम
क्या था ?
उत्तर: मिर्ज़ा गयास बेग
9. 'इलाहबाद की संधि' किन दो पक्षों के बीच हुई थी ?
उत्तर: अंग्रेजों तथा शाहआलम द्वितीय के बीच
10. लॉर्ड वेलेजली के साथ सबसे पहले सहायक संधि किस राज्य के शासक ने
की ?
उत्तर: हैदराबाद के निजाम ने

एक पुस्‍तकालय ऐसा भी।

सरस्वती पुस्तकालय= शेखावाटी जनपद के सीकर जिले के फतेहपुर कस्बे मेँ यह पुस्तकालय स्थित है। इस पुस्तकालय मेँ सैँकङोँ की तादाद मेँ अलभ्य दुर्लभ ग्रन्थ,साहित्यिक पुस्तक,नक्शे,पाण्डुलिपियोँ,तांत्रिक ग्रन्थ आदि हस्तलिखित उपलब्ध है, यह पुस्तकालय फतेहपुर ट्रस्ट द्वारा संचालित है। जिसके अध्यक्ष रामगोपाल वर्मा है यह पुस्तकालय राष्ट्रीय निधि है। यहाँ साहित्य का अदभुत
भंडार है जो अन्य पुस्तकालयोँ के लिए एक आदर्श है। इस पुस्तकालय के शोध ग्रन्थोँ के सहयोग से हजारोँ लोगोँ ने अब तक डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है।

गौतम बुद्व की कहानियां

गौतम बुद्व की कहानी-- रुरु मृग
रुरु एक मृग था। सोने के रंग में ढला उसका सुंदर सजीला बदन; माणिक, नीलम और पन्ने की कांति की चित्रांगता से शोभायमान था। मखमल से मुलायम उसके रेशमी बाल, आसमानी आँखें तथा तराशे स्फटिक-से उसके खुर और सींग सहज ही किसी का मन मोह लेने वाले थे। तभी तो जब भी वह वन में चौकडियाँ भरता तो उसे देखने वाला हर कोई आह भर उठता।

जाहिर है कि रुरु एक साधारण मृग नहीं था। उसकी अप्रतिम सुन्दरता उसकी विशेषता थी। लेकिन उससे भी बड़ी उसकी विशेषता यह थी कि वह विवेकशील था ; और मनुष्य की तरह बात-चीत करने में भी समर्थ था। पूर्व जन्म के संस्कार से उसे ज्ञात था कि मनुष्य स्वभावत: एक लोभी प्राणी है और लोभ-वश वह मानवीय करुणा का भी प्रतिकार करता आया है। फिर भी सभी प्राणियों के लिए उसकी करुणा प्रबल थी और मनुष्य उसके करुणा-भाव के लिए कोई अपवाद नहीं था। यही करुणा रुरु की सबसे बड़ी विशिष्टता थी।

एक दिन रुरु जब वन में स्वच्छंद विहार कर रहा था तो उसे किसी मनुष्य की चीत्कार सुनायी दी। अनुसरण करता हुआ जब वह घटना-स्थल पर पहुँचा तो उसने वहाँ की पहाड़ी नदी की धारा में एक आदमी को बहता पाया। रुरु की करुणा सहज ही फूट पड़ी। वह तत्काल पानी में कूद पड़ा और डूबते व्यक्ति को अपने पैरों को पकड़ने कि सलाह दी। डूबता व्यक्ति अपनी घबराहट में रुरु के पैरों को न पकड़ उसके ऊपर की सवार हो गया। नाजुक रुरु उसे झटक कर अलग कर सकता था मगर उसने ऐसा नहीं किया। अपितु अनेक कठिनाइयों के बाद भी उस व्यक्ति को अपनी पीठ पर लाद बड़े संयम और मनोबल के साथ किनारे पर ला खड़ा किया।

सुरक्षित आदमी ने जब रुरु को धन्यवाद देना चाहा तो रुरु ने उससे कहा, "अगर तू सच में मुझे धन्यवाद देना चाहता है तो यह बात किसी को ही नहीं बताना कि तूने एक ऐसे मृग द्वारा पुनर्जीवन पाया है जो एक विशिष्ट स्वर्ण-मृग है; क्योंकि तुम्हारी दुनिया के लोग जब मेरे अस्तित्व को जानेंगे तो वे निस्सन्देह मेरा शिकार करना चाहेंगे।" इस प्रकार उस मनुष्य को विदा कर रुरु पुन: अपने निवास-स्थान को चला गया।

कालांतर में उस राज्य की रानी को एक स्वप्न आया। उसने स्वप्न में रुरु साक्षात् दर्शन कर लिए। रुरु की सुन्दरता पर मुग्ध; और हर सुन्दर वस्तु को प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा से रुरु को अपने पास रखने की उसकी लालसा प्रबल हुई। तत्काल उसने राजा से रुरु को ढूँढकर लाने का आग्रह किया। सत्ता में मद में चूर राजा उसकी याचना को ठुकरा नहीं सका। उसने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो कोई-भी रानी द्वारा कल्पित मृग को ढूँढने में सहायक होगा उसे वह एक गाँव तथा दस सुन्दर युवतियाँ पुरस्कार में देगा।

राजा के ढिंढोरे की आवाज उस व्यक्ति ने भी सुनी जिसे रुरु ने बचाया था। उस व्यक्ति को रुरु का निवास स्थान मालूम था। बिना एक क्षण गँवाये वह दौड़ता हुआ राजा के दरबार में पहुँचा। फिर हाँफते हुए उसने रुरु का सारा भेद राजा के सामने उगल डाला।

राजा और उसके सिपाही उस व्यक्ति के साथ तत्काल उस वन में पहुँचे और रुरु के निवास-स्थल को चारों ओर से घेर लिया। उनकी खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्होंने रुरु को रानी की बतायी छवि के बिल्कुल अनुरुप पाया। राजा ने तब धनुष साधा और रुरु उसके ठीक निशाने पर था। चारों तरफ से घिरे रुरु ने तब राजा से मनुष्य की भाषा में यह कहा "राजन् ! तुम मुझे मार डालो मगर उससे पहले यह बताओ कि तुम्हें मेरा ठिकाना कैसे मालूम हुआ ?"

उत्तर में राजा ने अपने तीर को घुमाते हुए उस व्यक्ति के सामने रोक दिया जिसकी जान रुरु ने बचायी थी। रुरु के मुख से तभी यह वाक्य हठात् फूट पड़ा

"निकाल लो लकड़ी के कुन्दे को पानी से
न निकालना कभी एक अकृतज्ञ इंसान को।"

राजा ने जब रुरु से उसके संवाद का आशय पूछा तो रुरु ने राजा को उस व्यक्ति के डूबने और बचाये जाने की पूरी कहानी कह सुनायी। रुरु की करुणा ने राजा की करुणा को भी जगा दिया था। उस व्यक्ति की कृतध्नता पर उसे रोष भी आया। राजा ने उसी तीर से जब उस व्यक्ति का संहार करना चाहा तो करुणावतार मृग ने उस व्यक्ति का वध न करने की प्रार्थना की।

रुरु की विशिष्टताओं से प्रभावित राजा ने उसे अपने साथ अपने राज्य में आने का निमंत्रण दिया। रुरु ने राजा के अनुग्रह का नहीं ठुकराया और कुछ दिनों तक वह राजा के आतिथ्य को स्वीकार कर पुन: अपने निवास-स्थल को लौट गया।